डार्क सर्कल भी गहरी कहानी कहते हैं।
आँखों के नीचे बने डार्क सर्कल भी एक कहानी बयां करते हैं। उस सपने को परिभाषित करते हैं, जिसे एक निम्नवर्गीय परिवार का कोई भी लड़का आज के परिवेश में देखना तो दूर, सोचने का भी साहस नहीं कर सकता। जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ एक ऐसे दुस्साहस की जिसे पढ़ाई कहते हैं। जब मैं दसवीं क्लास में था मुझे बताया गया दसवीं पास करना बहुत कठिन है। और फर्स्ट डिवीजन का तो सोचना भी असंभव है। मेरे मन में एक सवाल आया- ऐसा क्या है यार इस परीक्षा में? यह सवाल मुझे साल भर कभी न भूला। विद्यालय में जो पढ़ाया जाता रहा, उसी को पढ़ता रहा। लेकिन मन में यह भी सोचता रहा कि अगर यही सब परीक्षा में आना है; तो परीक्षा इतनी कठिन कैसे होगी? दिन बीते और परीक्षा का समय भी आया। प्रश्न सामान्य थे और उत्तर देने का ढंग भी लगभग वैसा ही था। लेकिन रिजल्ट आने पर पता चला कि मैंने बहुत बड़ा तीर मार लिया है। लोगों को भरोसा ही नहीं हुआ कि यह कैसे हो गया? और भरोसा हो भी क्यों? 3 बजे रात से उठकर अंग्रेजी के पैराग्राफ रटने का रूटीन मैंने बनाया था, लोगों ने नहीं ? गणित के चार- चार पन्ने के सवालों को चालीस-चालीस बार लिखने की आदत मैंने ...